The Role of the Dalit Community in the Strategies of Political Parties: A Study in the Context of Bihar and India
राजनीतिक दलों की रणनीतियों में दलित समुदाय की भूमिकाः बिहार और भारत के संदर्भ में एक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.31305/rhimrj.2026.v13n08.009Keywords:
Dalit Politics, Bihar, Mahadalit, Social Justice, Reserved Constituencies, Scheduled Castes, Caste Mobilization, Democratic RepresentationAbstract
In Indian democracy, caste has not remained merely a social fact but has also functioned as a powerful political category. After independence, the Dalit community, positioned at the lowest level of the social hierarchy, gradually emerged as an important centre of political mobilization and bargaining. Bihar, where the Scheduled Caste population constitutes approximately one-fifth of the state’s total population, is particularly significant in this context. This research paper examines how political parties such as the Rashtriya Janata Dal, Janata Dal (United), Bharatiya Janata Party, Lok Janshakti Party, and Bahujan Samaj Party have attempted to place the Dalit community at the centre of their respective electoral strategies. The study is based on secondary sources, including Census data, the Bihar Caste-Based Survey (2022), data from the Election Commission of India, CSDS-Lokniti surveys, and available scholarly literature. The findings indicate that the Dalit electorate is not a homogeneous group but is divided along sub-caste lines, and the ‘Mahadalit’ category introduced by the Nitish Kumar government in 2007 institutionalized this division at the policy level. The paper argues that Dalit-centred politics largely remains confined to symbolic representation and welfare schemes, while structural issues such as land reforms, education, and economic empowerment often continue to remain on the margins.
Abstract in Hindi Language: भारतीय लोकतंत्र में जाति केवल एक सामाजिक तथ्य नहीं रही, बल्कि एक सशक्त राजनीतिक श्रेणी के रूप में भी काम करती आई है। स्वतंत्रता के पश्चात सामाजिक पदानुक्रम में सबसे निचले पायदान पर खड़ा दलित समुदाय धीरे-धीरे राजनीतिक गोलबंदी और सौदेबाजी का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। बिहार, जहाँ अनुसूचित जाति की जनसंख्या राज्य की कुल आबादी के लगभग पाँचवें हिस्से के बराबर है, इस दृष्टि से विशेष रूप से उल्लेखनीय राज्य है। प्रस्तुत शोध पत्र इस बात की पड़ताल करता है कि किस प्रकार राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), भारतीय जनता पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों ने अपनी-अपनी चुनावी रणनीतियों में दलित समुदाय को केंद्र में रखने का प्रयास किया है। अध्ययन द्वितीयक स्रोतोंकृजनगणना आँकड़ों, बिहार जाति आधारित गणना (2022), भारत निर्वाचन आयोग के आँकड़ों, सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वेक्षणों तथा उपलब्ध विद्वत्तापूर्ण साहित्यकृपर आधारित है। निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि दलित मतदाता समूह अखंड नहीं, बल्कि उप-जातीय आधार पर विभाजित है, और वर्ष 2007 में नीतीश कुमार सरकार द्वारा लागू की गई ‘महादलित‘ श्रेणी ने इस विभाजन को नीतिगत रूप से संस्थाबद्ध कर दिया। पत्र यह तर्क प्रस्तुत करता है कि दलित-केंद्रित राजनीति अधिकांशतः प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित रह जाती है, जबकि भूमि सुधार, शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण जैसे संरचनात्मक प्रश्न प्रायः हाशिये पर ही बने रहते हैं।
Keywords: दलित राजनीति, बिहार, महादलित, सामाजिक न्याय, आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र, अनुसूचित जाति, जातीय लामबंदी, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व।
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